पालिताना की पहाड़ी पर 800 से अधिक मंदिर हैं, लेकिन पाँच प्रमुख चैत्य (मंदिरों) की वंदना का विशेष विधान है:
इन पाँचों पर यदि भावपूर्वक चैत्यवंदन किया जाए, तो यात्रा का फल अक्षय हो जाता है।
मूल पाठ:
णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व साहूणं।
हिंदी अर्थ:
मैं अरिहंत (तीर्थंकर) को नमस्कार करता हूँ, मैं सिद्ध (मुक्त आत्माओं) को नमस्कार करता हूँ, मैं आचार्य को नमस्कार करता हूँ, मैं उपाध्याय को नमस्कार करता हूँ, मैं संसार के समस्त साधुओं को नमस्कार करता हूँ। palitana 5 chaityavandan in hindi full
विशेषता: यह सभी चैत्यवंदन का आधार है। पालीताना में पहले चैत्यवंदन के रूप में यह 'पंच परमेष्ठि' को समर्पित है।
पालीताना में केवल मंत्रों का उच्चारण करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि एक विशेष क्रम का पालन करना चाहिए:
मूल पाठ:
आउरियाए चाउरियाए, देउलियाए चिट्ठिआणं। छप्पि आसण पडिमाणं, णमो णमो वंदामि णिच्चं।
हिंदी अर्थ:
जो मंदिर में विराजमान हैं, जो आसन पर विराजमान हैं, जो खड़े हैं, चारों दिशाओं में स्थित हैं, अथवा छह प्रकार की प्रतिमाओं में स्थित हैं – उन सभी जिनेन्द्रों को मैं नित्य (प्रतिदिन) नमस्कार करता हूँ, वंदना करता हूँ।
सामान्य चैत्यवंदन एक बार किया जाता है, लेकिन 5 चैत्यवंदन का अर्थ है—पालीताणा की पहाड़ी पर पाँच प्रमुख स्थानों (टेकरियों) पर जाकर विधिपूर्वक चैत्यवंदन करना। ये पाँच स्थान हैं:
गहन अध्ययन: कुछ आगमों के अनुसार, ये पाँच चैत्यवंदन पाँच कल्याणक (च्यवन, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान, मोक्ष) के प्रतीक हैं।
मूल पाठ:
जं शत्रुंजयं संतं, संसार डहणं जिणे। जिणसासण विहारं तं, णमंसिज्ज भवंतले। मूल पाठ:
हिंदी अर्थ:
उस शत्रुंजय पहाड़ी को, जो सभी शत्रु रूपी कर्मों का दहन करने वाली है, जहाँ जिनेन्द्र भगवान का विहार हुआ, उस क्षेत्र को मैं इस भवसागर (संसार) में नमस्कार करता हूँ।
नोट: पालीताना में चौथा चैत्यवंदन स्वयं पहाड़ी तथा वहाँ के सिद्ध क्षेत्र को नमन है।
पालीताणा की 863 सीढ़ियाँ केवल शारीरिक तप नहीं, बल्कि आत्मा के उत्थान की सीढ़ियाँ हैं। यहाँ पाँच बार चैत्यवंदन करने की परंपरा आचार्य हेमचंद्रसूरी और कुमारपाल के समय से प्रचलित है। ऐसी मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से पाँच चैत्यवंदन करता है, उसे पाँचों इंद्रियों के विकारों से मुक्ति मिलती है।
गुजरात के भावनगर जिले में स्थित पालीताना नगर विश्वप्रसिद्ध है। यहाँ शत्रुंजय पर्वत पर 863 से अधिक मंदिर हैं, जिन्हें संगमरमर की कला का चमत्कार कहा जाता है। लेकिन इन मंदिरों की आत्मा है- पाँच चैत्यवंदन। यह एक विशेष सामूहिक प्रार्थना और वंदना है, जो भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) के प्रति समर्पण का सर्वोच्च स्वरूप मानी जाती है। उस शत्रुंजय पहाड़ी को
कहा जाता है कि जो भी श्रद्धालु तीन किलोमीटर लंबी इस 3500 सीढ़ियों वाली यात्रा को पूरा करता है, वह केवल मंदिर नहीं देखता, बल्कि 5 चैत्यवंदन के माध्यम से अपने आत्मा का साक्षात्कार करता है।